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यौन संचारित संक्रमण (STIs): खामोशी से फैलती बीमारियां

मुंबई। एड्स एक जाना-पहचाना नाम है, लेकिन सिफलिस, गोनोरिया, क्लैमाइडिया और ह्यूमन पेपिलोमावायरस (HPV) जैसे यौन संचारित संक्रमण (एसटीआई) भारत में एक ...

ByThinkIndia.press Bureau
Published On 12 अग॰ 2026
यौन संचारित संक्रमण (STIs): खामोशी से फैलती बीमारियां
Representative Image [ThinkIndia.press Bureau]

मुंबई। एड्स एक जाना-पहचाना नाम है, लेकिन सिफलिस, गोनोरिया, क्लैमाइडिया और ह्यूमन पेपिलोमावायरस (HPV) जैसे यौन संचारित संक्रमण (एसटीआई) भारत में एक शांत महामारी की तरह पांव पसार रहे हैं। राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, देश में एसटीआई मामलों में पिछले पांच वर्षों में 18 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है, जिसमें सबसे अधिक मामले 20 से 35 वर्ष के युवाओं में देखे जा रहे हैं।

चिंता की बात यह है कि इनमें से 60 प्रतिशत रोगियों में कोई स्पष्ट लक्षण नहीं दिखते। स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. मीता दास कहती हैं, “क्लैमाइडिया और गोनोरिया को साइलेंट इंफेक्शन कहा जाता है। इनका समय पर इलाज न होने पर महिलाओं में पेल्विक इंफ्लेमेटरी डिजीज, अस्थानिक गर्भावस्था और यहां तक कि स्थायी बांझपन का खतरा रहता है।” पुरुषों में यह इंफेक्शन प्रोस्टेट ग्रंथि तक को प्रभावित कर सकता है।

इन संक्रमणों के प्रति लोगों की लापरवाही और सामाजिक शर्म एक बड़ी बाधा है। पटना के एक सरकारी अस्पताल के आंकड़े बताते हैं कि अधिकतर मरीज़ बिना डॉक्टरी सलाह के मेडिकल स्टोर से एंटीबायोटिक खरीद लेते हैं, जिससे दवा प्रतिरोधक क्षमता यानी एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस का खतरा बढ़ रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने ‘सुपर गोनोरिया’ को लेकर पहले ही चेतावनी जारी कर दी है, जिस पर आम एंटीबायोटिक्स असर नहीं करतीं।

दूसरा महत्वपूर्ण पहलू है एचपीवी, जो सर्वाइकल कैंसर का प्रमुख कारण है। भारत में सर्वाइकल कैंसर महिलाओं में होने वाला दूसरा सबसे आम कैंसर है। हैरानी की बात यह है कि इसका सुरक्षा कवच यानी एचपीवी वैक्सीन उपलब्ध होने के बावजूद जागरूकता की कमी के कारण 2 प्रतिशत से भी कम पात्र लड़कियों को यह टीका लग पाया है। सरकार ने हाल ही में 9-14 वर्ष की लड़कियों के लिए राष्ट्रीय टीकाकरण अभियान की घोषणा की है, जो एक स्वागतयोग्य कदम है।

पुरुषों के स्वास्थ्य को भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। सिफलिस के मामले हर आयु वर्ग में लौट रहे हैं और कई बार इसके लक्षण अन्य रोगों से मिलते-जुलते होते हैं, जिसे “ग्रेट इमिटेटर” कहा जाता है। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि जो भी व्यक्ति एक से अधिक साथी के साथ यौन संबंध रखता है, उसे हर छह महीने में एक बार एसटीआई जांच अवश्य करानी चाहिए। कंडोम का लगातार और सही इस्तेमाल, और लक्षण दिखने पर तुरंत इलाज ही बचाव का एकमात्र रास्ता है। खुले संवाद और नियमित स्क्रीनिंग के बिना हम इस खामोश खतरे को नहीं हरा सकते।

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