पोर्नोग्राफी और कल्पना: क्या उम्मीद करें, क्या नहीं
बेंगलुरु। इंटरनेट के युग में किशोरों के लिए यौन शिक्षा का पहला शिक्षक स्कूल या माता-पिता नहीं, बल्कि पोर्नोग्राफी बन गई है। एक अध्ययन के अनुसार, 13...
बेंगलुरु। इंटरनेट के युग में किशोरों के लिए यौन शिक्षा का पहला शिक्षक स्कूल या माता-पिता नहीं, बल्कि पोर्नोग्राफी बन गई है। एक अध्ययन के अनुसार, 13 वर्ष की आयु तक 65 प्रतिशत भारतीय लड़के किसी न किसी तरह की पोर्नोग्राफिक सामग्री देख चुके होते हैं। समस्या यह है कि यह मनोरंजन के लिए निर्मित एक फंतासी है, जिसे देखकर युवा वास्तविक यौन संबंधों के बारे में अवास्तविक अपेक्षाएं बना लेते हैं।
“मुख्यधारा की पोर्नोग्राफी में दिखाया जाने वाला शरीर, स्टैमिना और एक्ट का तरीका वास्तविक जीवन के सेक्स से बहुत अलग है,” सेक्स एजुकेटर आरुष कहते हैं। “यह न तो सहमति सिखाती है, न संवाद, न ही सुरक्षा।” युवाओं में बॉडी इमेज की समस्या, प्रदर्शन का दबाव और महिला संतुष्टि की अनदेखी, ये सब अक्सर पोर्न से प्राप्त शिक्षा के दुष्परिणाम हैं। दूसरी ओर, नैतिक पोर्न (एथिकल पोर्न) की एक लहर भी उभर रही है, जो सहमति, विविध शारीरिक संरचना और वास्तविक अंतरंगता पर ज़ोर देती है।
विशेषज्ञ पूर्ण प्रतिबंध से अधिक, डिजिटल साक्षरता और समझदारी पर जोर देते हैं। माता-पिता को इस विषय पर चुप्पी तोड़ते हुए बच्चों को ‘रील लाइफ’ और ‘रियल लाइफ’ का अंतर समझाना चाहिए। पोर्न एक शिक्षाप्रद सामग्री नहीं है, और यही संदेश अगर सही समय पर दे दिया जाए, तो युवा पीढ़ी यौन संबंधों को अधिक स्वस्थ और सहमति-आधारित नज़रिये से देख पाएगी।

