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गर्भनिरोधन: ज़िम्मेदारी सिर्फ महिला की नहीं

भोपाल। परिवार नियोजन के नाम पर भारत में अब भी सारा बोझ महिलाओं के कंधों पर है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 के अनुसार, 67 प्रतिशत मामलों ...

ByThinkIndia.press Bureau
Published On 12 अग॰ 2026
गर्भनिरोधन: ज़िम्मेदारी सिर्फ महिला की नहीं
Representative Image [ThinkIndia.press Bureau]

भोपाल। परिवार नियोजन के नाम पर भारत में अब भी सारा बोझ महिलाओं के कंधों पर है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 के अनुसार, 67 प्रतिशत मामलों में महिला नसबंदी ही गर्भनिरोध का प्रमुख साधन बनी हुई है, जबकि पुरुष नसबंदी की दर मात्र 0.3 प्रतिशत है। यह आंकड़ा लैंगिक असमानता को सिर्फ प्रजनन स्वास्थ्य के क्षेत्र में ही नहीं, बल्कि सामाजिक सोच में भी दर्शाता है।

गर्भनिरोधकों की दुनिया अब मौखिक गोलियों और कॉपर-टी से कहीं आगे निकल चुकी है। मेडिकल स्टोर की शेल्फ पर अब इमरजेंसी कॉन्ट्रासेप्टिव पिल्स, इंजेक्टेबल कॉन्ट्रासेप्टिव (जैसे एंटारा), इम्प्लांट और वैजाइनल रिंग जैसे विकल्प भी मौजूद हैं। इमरजेंसी पिल्स, जिन्हें आम भाषा में ‘मॉर्निंग आफ्टर पिल’ भी कहते हैं, को लेकर सबसे ज़्यादा भ्रांतियां फैली हैं। स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. रश्मि सिंह बताती हैं, “यह एक आपातकालीन उपाय है, नियमित गर्भनिरोधक नहीं। हर महीने इसका सेवन हार्मोनल असंतुलन पैदा कर सकता है। इसके इस्तेमाल से पहले और बाद में डॉक्टरी सलाह ज़रूरी है।”

दूसरी ओर, पुरुष गर्भनिरोधन एक उपेक्षित विषय रहा है। कंडोम के अलावा पुरुषों के पास कोई अस्थायी हार्मोनल गर्भनिरोधक बाज़ार में नहीं है, यद्यपि कई शोध जारी हैं। पश्चिमी देशों में पुरुषों के लिए जेल-आधारित गर्भनिरोधक का ट्रायल चल रहा है, जिसे कंधे पर लगाने से शुक्राणुओं की संख्या कम हो जाती है। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) भी एक नॉन-हार्मोनल पुरुष गर्भनिरोधक इंजेक्शन ‘RISUG’ पर काम कर रहा है, जो एक बार लगवाने पर 10-13 साल तक प्रभावी रह सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक पुरुषों के लिए सरल, सुलभ और प्रभावी विकल्प नहीं आते, तब तक परिवार नियोजन में उनकी बराबर की भागीदारी एक दिवास्वप्न ही रहेगी।

ग्रामीण भारत में अब भी गर्भनिरोधकों को लेकर कई मिथक प्रचलित हैं जैसे ‘इनसे कमज़ोरी आती है’ या ‘बच्चे पैदा करने की क्षमता खत्म हो जाती है।’ आशा कार्यकर्ताओं के प्रयासों से अब जागरूकता बढ़ रही है, लेकिन अब भी काफी काम बाकी है। सरकार को सिर्फ लक्ष्य पूरा करने के लिए नहीं, बल्कि गुणवत्तापूर्ण परामर्श सेवाएं देने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, ताकि हर जोड़ा अपनी सुविधा और स्वास्थ्य के अनुसार सही विकल्प चुन सके।

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